Pratinidhi Kahaniyan -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare 
  • समीक्षित पुस्तक : प्रतिनिधि कहानियाँ
  • द्वारा: राजेन्द्र राजन
  • विधा : कहानी
  • समृद्ध पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित
  • प्रथम संस्करण: 2026
  • मूल्य : 299.00
  • समीक्षा क्रमांक : 224

                                                                                        

पुस्तक का फ्रन्ट कवर

समीक्षाधीन पुस्तक, “प्रतिनिधि कहानियाँ” राजेन्द्र राजन की उन चुनिंदा कहानियों का संग्रह है जो विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई एवं बेहद पसंद की गईं। राजेन्द्र राजन एक ऐसी शक्सीयत, जिनका काम ही उनकी पहचान बन चुका है एवं उनका अलग से परिचय देना औपचारिकता भले ही हो, दरकार तो कदापि नहीं, फिर भी गर बात करें उनके साहित्यिक योगदान की तो उनके द्वारा सृजित अनेकों कहानी संग्रह, उपन्यास एवं संस्मरण तथा शोध ग्रंथों के संग, “हीरा मंडी”, जैसे बहुचर्चित उपन्यास एवं “पापा आर यू ओ के” जैसे कहानी संग्रह तथा Amazon बेस्टसेलर यात्रा संस्मरण “मेरी मयनोशी के किस्से” साहित्य जगत को देकर उन्होंने वह स्थान हासिल कर लिया है जहां तक पहुंचने के ख्वाब बहुधा साहित्यजगत में बहुसंख्य साहित्य सृजक देखते हैं इसके साथ ही उनका सिनेमा जगत में लेखक, निर्देशक सहित तमाम क्षेत्रों में उनका गहरा दखल उन्हें विशिष्ट शख्सियत बनाता है।

साहित्य जगत में उन्हें समय समय पर विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा गया है। एवं साहित्यिक सृजन में उनकी सक्रियता निश्चय ही उनके साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर विराजित होने के स्पष्ट प्रमाण हैं।

इस कहानी संग्रह “प्रतिनिधि कहानियां” में राजन जी की 11 श्रेष्ट कहानियों को संग्रहीत किया गया है जिसे समृद्ध पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।

pustak ka back cover



“पापा आर यू ओके”, कश्मीर के हालात, को अत्यंत भावुकता से दर्शाती, यूं तो बस एक वाक्य की ही बात है, लेकिन मानो इसके जरिए सारी घाटी के गंभीर हालात खोलकर सामने रख दिए गए। हज गए हुए पिता से फोन पर बात कर के हाल चाल जानने को बेताब बेटी की मनोदशा और मुश्किलात को बखूबी जाहिर करती है कहानी। बीच में हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि उस बच्ची के साथ पाठक भी सारी उम्मीदें छोड़ देते हैं, घाटी में हालातों के चलते बरती जा रही सुरक्षा संबंधित सावधानियों के चलते वहां के वाशिंदों की परेशानियों का विस्तृत वर्णन है।

राजनीति की बखिया उधेड़ती और एक ही नहीं अनेकों कड़वी सच्चाइयों को सामने रखती है कहानी “लेखक की मौत” जहाँ एक शीर्ष पद से सेवा निवृत प्रशासनिक अधिकारी जो अच्छे लेखक भी हैं, जन सेवा की सच्ची भावना दिल में पाले एक बड़ी राजनैतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण करते हैं किन्तु अस्लियत सामने आते तक उनके सपनों के साथ साथ इनके लेखक का भी दम घट चुका होता है।

“विदाई वेला”, कथानक में पात्रों की निश्छलता, भावों की निर्मलता एवं व्यवहार में सरलता स्पष्ट लक्षित है। आधुनिकता की चालाकियों एवं चिकनी चुपड़ी लच्छे दार बातों की अपेक्षा सरल व्यवहारिक बात चीत प्रभावित करती है। वहीं माँ के प्रति बेटे के भाव भी उसकी व्यवहारिकता से भी अधिक, दुनियादारी से दूर उसकी सरलता दर्शाते हैं।

lekhak rajendra rajan ka photo


कहानी “कंफर्ट ज़ोन”, हालात की क्रूरतम मार के बीच दरकती संवेदनाओं और अपनों की बिखरती मानवीयता को कोरोना काल की काली छाया के परिवेश में एक ऐसे बेटे के मनोभावों को दर्शाती है जो स्वयं रिटायर है, आय का कोई जरिया नहीं उस पर अतिवृद्ध माँ जो अब तब की स्थिति में है, उसके प्रति अपने ही बच्चों की कठोर होती या कहे मर चुकी संवेदनाएं, ग्राम वासियों का भी असहयोगात्मक रवैया उसे भीतर तक तोड़ देता है। मर्मस्पर्शी भाव है एवं मजबूर बेटे की मानसिक अवस्था को पूरी संवेदना भावुकता एवं हृदयस्पर्शी भावना के संग सामने रखा है। यहां तक कि मानसिक तनाव के वे हालत जहां बेटा परेशानियों से निजात पाने हेतु मां का गला दबा कर मुक्त हो जाना चाहता है और बच्चे जो मर्सी किलिंग या फिर उन्हें वृद्ध आश्रम भेजने के सुझाव से रहे होते हैं ।

कहानी “पतझड़ इधर उधर”, जनरेशन गैप के बीच आसमान मानसिकताओं और भिन्न विचारधाराओं तथा प्राथमिकताओं के चलते बढ़ती जाती एक खाई और नितप्रति कम करने के प्रयासों के बावजूद बढ़ते जाते फासलों का लेखा जोखा है। जहां युवाओं की प्राथमिकताएं अपनी पिछली पीढ़ी से बिल्कुल भिन्न हैं वहीं पिछली पीढ़ी प्राथमिकताओं के सिवाय भावनात्मक रूप से भी नई पीढ़ी के हितों के विषय में सोच कर चिंतित है किन्तु युवा पीढ़ी को उनका किसी भी प्रकार का दखल बर्दाश्त नहीं।

“हिटलर की औलाद”, व्यवस्था पर तीखी चोट करती कहानी है, रेलवे पुलिस को कथानक के केंद्र में रखते हुए उसके व्यवहार एवं कार्य प्रणाली का सड़ांध मारता ताबूत खोल दिया है जहां सिर्फ गंदगी शेष है। लाशों की दलाली पर उनके स्वयं को सही साबित करते तर्क सुन आम इंसान का भी खून खोल उठे।

पुस्तक में सुंदर व रोचक कथानक की सरल भावप्रवण भाषा शैली के संग संग प्राकृतिक दृश्यों का भी मनोहारी वर्णन प्रस्तुत किया गया है। यथा “कच्ची कुम्हलाई सी धूप किसी कमसिन सी चहलकदमी करती देवदार की फुनगियों को चूमने लगी। नरम मुलायम मद्विम सी किरणें मिनी के स्याह कमरे के रोशनदान के शहतीर का आकार ग्रहण करती हुई फर्श पर यूं बिछ गई मानो वह अपने खोए हुए वजूद को तलाश रही हो। धूप ने जल्द ही घर, आँगन, पेड़, पौधों,नदी, हर ज़र्रे को अपने आगोश में ले लिया।

कहानी “नज़रबंद”, महिलाओं की माहवारी को पहाड़ों में अभिशाप के रूप में माना जाता है। उस से ही जुड़ी हुई विभिन्न धारणाएं, कुप्रथाएं, जिन्हें वहां के पढ़े लिखे लोग भी ग्रामीण जनों के डर एवं क्रोध के चलते विरोध नहीं कर पाते। उस माहौल में पहुंची नई बहु की पीड़ा दर्शायी गई है वहीं कहानी का अंत समाधान अथवा संघर्ष एवं प्रतिकार की ओर न जाकर पलायन दर्शाया है जिस पर काम किया जाना चाहिए ताकि समाज को एक सकारात्मक संदेश दिया जा सके।

“प्रेतयोनि”, मृत्युपरांत मोक्ष के नाम पर किए जाने वाले कर्मकांड जैसी कुप्रथा सदियों से समाज में व्याप्त है जिसके विरोध में अत्यंत मुखरता के संग आवाज़ बुलंद करती है यह कहानी जहां एक प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति ने विदेश में जीवन बसर कर अर्जित अपनी धन संपदा को अपने पैतृक गांव पर विभिन्न जन कल्याण कारी कार्यों हेतु न्योछावर कर दिया किन्तु उसके अत्यंत स्पष्टता पूर्वक रखे गये विचार जो पुरातन पंथियों के दकियानूसी विचारों से भिन्न थे, के खिलाफ उस के ही गाँव के पुरखे पंडे विरोध में खड़े हो गए। पंडों पुरोहितों को तो कोरोना की महामारी की आपदा एक अवसर प्रतीत हो रही थी एवं उस पर एक संपन्न व्यक्ति की मृत्यु से वे बहुत कुछ अर्जित कर अपने घर भर लेना चाहते थे, किंतु प्रगतिशील पिता की प्रगतिशील बेटी पिता की भावनाओं का सम्मान करते हुए रिश्तेदारों तथा पोंगापंथियों के खिलाफ खड़ी होती है। एक महत्वपूर्ण गंभीर विषय को बेहद सहजता से प्रस्तुत किया गया है ।

कहानी “सलीबों का शहर” फिर एक बार कोरोना काल में श्मशान घाटों पर मची लूट का बिल्कुल यथार्थ वर्णन है, तब जब इंसान अपनों को भी छूने से डरने लगा था, और असंख्य मौतों के चलते शमशान घरों पर दाह संस्कार करने हेतु लंबी लंबी कतारें लगीं हुई थीं उस बीच कैसे पुलिस से लेकर पंडा तक हर कोई अपनी जेब की व्यवस्था देख रहा था। किसी को भी किसी अन्य की परेशानी या उसके परिवार की हुई गमी से कोई सरोकार न था। यह उस वक्त का एक ऐसा घिनोना यथार्थ था जिसे अमूमन हर उस व्यक्ति ने किसी न किसी रूप में भोगा जिसके घर में किसी की सामान्य अथवा असामान्य मौत हुई थी। कहानी में वर्णन काशी का है किन्तु यह स्थिति तो सारे देश में यूं ही थी, कही तोला कम तो कहीं माशा ज्यादा।

“वोट का टेंडर”,कहानी में रोचकता से वह सच सामने रख दिया गया जो हर किसी चुनाव में वर्षों से हम सभी देखते आ रहे हैं किन्तु उसके पीछे इतनी व्यवस्थित कार्य प्रणाली काम करती है यह कभी नहीं सोचा होगा। चुनावों में पैसे, शराब या साड़ियां बांटने का फॉर्मूला कोई नई बात नहीं है, नया है तो सिर्फ उस व्यवस्था को देखना जो इसके पीछे काम करती है। पूरा एक सुनियोजित सिस्टम बना हुआ है वोट खरीदने का, जहां साम दाम दंड भेद सब कुछ जायज़ से भी अधिक जायज और कानूनी है ।

व्यवस्था पर तीखे तंज करती हुई कहानी है “मातमपुर्सी”, सांकेतिक रूप में एक NGO से संबद्द एक युवक की मृत्यु पश्चात समाज, शासन, विपक्ष, मीडिया एवं यहाँ तक की गाँव वाले भी उस मौत के बीच में अपने हित के अवसर ढूंढ रहे थे। मृत्यु को किस तरह से अपनी स्वार्थ सिद्दी हेतु प्रयोग किया जाए यह कयास एवं प्रयास चलते रहे, यह बिल्कुल वही सब है जो वर्तमान जीवन यापन का एक अंग बन चुका है तथा इस तरह के घड़ियाली आँसू हम अमूमन रोज और दिन में कई कई बार देखते है किन्तु न तो व्यवस्था सुधरती है न ही हमारे हालात।

उपरोक्त सभी कहानियाँ विशिष्ट अभिव्यक्ति के संग कहीं गहरे तक जुड़ जाती हैं एवं अव्यक्त भाव विशेष प्रभावित करते हैं यथा “पापा आर यू ओ के” में बिटिया की मानसिक दशा, उसकी मनोभावनाएं, जब वह पिता को कॉल लगने के लिए वेटिंग में है। या फिर वे भावनाएं जो कंफ़र्ट जोन या “विदाई वेला” में उस बेटे ने महसूस करी होंगी जिसकी माँ के प्रति अपने कर्तव्य समझते हुए भी वह परिस्थितिवश मजबूर है। अमूमन प्रत्येक कहानी में अन्तर्गभित भाव अत्यंत प्रभावशाली है।

                     samikshak atulya khare ka photo                                                                                                                                          

           Pustak Samiksha : Atulya Khare 

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Gajshardool -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

क se kahaniyan -- Pustak samiksha : Atulya Khare

Morpankh By Praveen Banzara